राष्ट्रिय

शिक्षक दिवस विशेष: “शिक्षक नियति-निर्माता हैं”, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने देश के शिक्षकों के प्रति व्यक्त की कृतज्ञता

नई दिल्ली। शिक्षक दिवस के शुभ अवसर पर भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने देश के समस्त शिक्षकों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए उन्हें ‘नियति-निर्माता’ बताया। उन्होंने कहा कि शिक्षक केवल किताबी ज्ञान नहीं देते, बल्कि अपने व्यवहार और मार्गदर्शन से करोड़ों विद्यार्थियों में नैतिकता, कौशल और जीवन जीने की कला का संचार करते हैं।

महान विभूतियों की सीख: ‘आचार्यदेवो भव’ की परंपरा

  • डॉ. राधाकृष्णन और डॉ. कलाम का स्मरण: राष्ट्रपति ने पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के विचारों को याद किया। साथ ही डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का जिक्र करते हुए बताया कि वे हमेशा एक ‘शिक्षक’ के रूप में ही याद किए जाना पसंद करते थे।

  • उपनिषद और भारतीय संस्कृति: भारतीय परंपरा में गुरु को सदैव श्रद्धेय माना गया है। तैत्तिरीय उपनिषद का संदेश ‘आचार्यदेवो भव’ आज भी प्रासंगिक है, जो शिक्षकों को विद्यार्थियों से निस्वार्थ और भेदभाव रहित प्रेम की सीख देता है।

राष्ट्रपति ने साझा कीं जीवन की भावुक स्मृतियां

  • छात्र जीवन के अनुभव: वे अपने गांव से सातवीं कक्षा के बाद बाहर जाकर पढ़ने वाली पहली छात्रा थीं। उन्होंने अपने शिक्षकों के उस स्नेह को याद किया जो स्कूल के बाद भी घर आकर उन्हें पढ़ाया करते थे।

  • रायरंगपुर स्कूल की यादें: ओडिशा के श्री ऑरोबिंदो स्कूल में पढ़ाने के दिनों को याद करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि वे पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों को खेलकूद, संगीत और नाटकों में भी सक्रिय रखती थीं।

  • गांव का आवासीय विद्यालय: लगभग 11 वर्ष पूर्व अपने गांव में अनाथ व वंचित बच्चों के लिए शुरू किए गए स्कूल का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि 20 जून को अपने जन्मदिन पर वे उनसे मिलीं, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी पहुंचकर बच्चों का उत्साहवर्धन किया था।

कालिदास का संदर्भ और श्रेष्ठ शिक्षक के गुण

महाकवि कालिदास का उल्लेख करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि श्रेष्ठ शिक्षक वही है जिसके पास प्रचुर ज्ञान हो और उसे सहजता से समझाने की क्षमता भी हो। उन्होंने शिक्षकों को सलाह दी कि वे:

  • विद्यार्थियों में स्वतंत्र चिंतन, प्रश्न पूछने की आदत और तर्कशक्ति विकसित करें।

  • बच्चों के मन से भय निकालकर उनका मनोबल बढ़ाएं।

  • जिज्ञासा को प्रोत्साहित कर उन्हें सफल उद्यमी, वैज्ञानिक और सृजनशील कलाकार बनाएं।

“शिक्षण व्यवसाय नहीं, मानवता के निर्माण का व्रत है”

राष्ट्रपति ने कहा कि पढ़ाना महज एक नौकरी नहीं बल्कि मानवता के निर्माण का पवित्र व्रत है। अभिभावक बड़े विश्वास से अपने बच्चों को गुरुजनों के पास भेजते हैं, और इस पवित्र आस्था की रक्षा करना हर शिक्षक का परम धर्म है।

विकसित भारत के लिए भावी पीढ़ी का निर्माण

अंत में, राष्ट्रपति ने शिक्षकों से एक ऐसी नई पीढ़ी तैयार करने का आह्वान किया जो अपनी सांस्कृतिक परंपराओं का सम्मान करे, वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाए, पर्यावरण संरक्षण में योगदान दे और अंत्योदय के आदर्शों को आत्मसात करे। उन्होंने सभी देशवासियों से समर्पित शिक्षकों का सदैव सम्मान करने की अपील की।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button