
देहरादून: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान (ICAR-IISWC), देहरादून में जल संसाधनों के वैज्ञानिक और टिकाऊ प्रबंधन की दिशा में दो दिवसीय राष्ट्रीय स्तरीय प्रशिक्षण कार्यशाला का सोमवार को शुभारंभ हुआ। ‘इंटीग्रेटेड वाटर रिसोर्सेज मॉडलिंग एंड बेसिन मैनेजमेंट यूजिंग MIKE Hydro Basin’ विषय पर आयोजित इस कार्यशाला में देशभर से 400 से अधिक विशेषज्ञ, शोधकर्ता और विद्यार्थी ऑनलाइन व ऑफलाइन (हाइब्रिड मोड) माध्यम से भाग ले रहे हैं।
यह कार्यशाला ICAR-IISWC, स्प्रिंग एंड रिवर रिजुविनेशन अथॉरिटी (SARRA), देहरादून और DHI India के संयुक्त तत्वावधान में जल शक्ति मंत्रालय के INCCC प्रोजेक्ट के तहत आयोजित की जा रही है।
आधुनिक तकनीकों और डेटा-आधारित मॉडलिंग पर जोर
कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य प्रतिभागियों को ‘MIKE Hydro Basin’ सॉफ्टवेयर के माध्यम से जल संसाधन प्रबंधन और नदी बेसिन नियोजन की आधुनिक तकनीकों का व्यावहारिक प्रशिक्षण देना है।
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प्रशिक्षण के मुख्य बिंदु: GIS डेटा प्रोसेसिंग, हाइड्रोलॉजिकल सिमुलेशन, मॉडल सेट-अप, इनपुट डेटा तैयारी, मॉडल कैलिब्रेशन व वैलिडेशन, परिदृश्य विश्लेषण और निर्णय समर्थन प्रणाली (Decision Support System)।
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जलवायु परिवर्तन पर फोकस: जलवायु परिवर्तन के कारण जल संसाधनों पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन करने और भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप टिकाऊ जल प्रबंधन रणनीति विकसित करने पर विशेष जोर दिया जा रहा है।
आयोजन अध्यक्ष एवं प्रधान वैज्ञानिक डॉ. अमरीश कुमार ने स्वागत भाषण में कहा कि वैज्ञानिक आंकड़ों और आधुनिक मॉडलिंग तकनीकों का उपयोग जल संसाधनों के दीर्घकालिक और बेहतर नियोजन में मील का पत्थर साबित होगा।
विशेषज्ञों के व्याख्यान और व्यावहारिक प्रशिक्षण (Hands-on Training)
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नदी पुनरुद्धार की रणनीतियां: राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान (NIH), रुड़की के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. आर.पी. पांडे ने हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए नदियों के पुनरुद्धार के लिए समेकित और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने पर बल दिया।
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सॉफ्टवेयर का व्यावहारिक ज्ञान: DHI India की विशेषज्ञ टीम ने ‘MIKE Hydro Basin’ के टूल्स और कार्यप्रणाली की जानकारी दी। वहीं, NIH रुड़की के वैज्ञानिक डॉ. अजय अहिरवार ने मॉडल सेट-अप और इनपुट डेटा तैयार करने का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया।
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भूजल पुनर्भरण पर चर्चा: CSSRI करनाल के पूर्व निदेशक डॉ. एस.के. कामरा ‘वाटर पॉजिटिव लैंडस्केप’ विकसित करने हेतु भूजल पुनर्भरण संरचनाओं के डिजाइन, उपयुक्त स्थल चयन और उनके प्रभावी क्रियान्वयन पर अपने विचार साझा करेंगे।
जल सुरक्षा और सतत विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम
विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती जल मांग, अनियमित वर्षा, भूजल स्तर में गिरावट और जलवायु परिवर्तन के इस दौर में केवल पारंपरिक उपाय पर्याप्त नहीं हैं। डेटा-आधारित वैज्ञानिक विश्लेषण और आधुनिक निर्णय समर्थन प्रणालियाँ भविष्य की जल नीतियों के निर्धारण में अहम भूमिका निभाएंगी।
आयोजकों के अनुसार, यह कार्यशाला वैज्ञानिकों, नीति-निर्माताओं और युवा शोधकर्ताओं के बीच तकनीकी अनुभव के आदान-प्रदान का एक मजबूत मंच बनेगी, जिससे हिमालयी व अन्य नदी बेसिनों के समेकित प्रबंधन और जल सुरक्षा को बढ़ावा मिलेगा।
कार्यक्रम में उपस्थित प्रमुख गणमान्य व्यक्ति
कार्यशाला में संयुक्त निदेशक (जलागम) डॉ. ए.के. डिमरी, उप निदेशक (SARRA) डॉ. डी.एस. रावत, संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. वेंकटेश, डॉ. उदय मंडल और डॉ. रमा पाल सहित अनेक वैज्ञानिक व जल विशेषज्ञ उपस्थित रहे।



