
देहरादून। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने उत्तराखंड प्रवास के दूसरे दिन सोमवार को देहरादून के हिमालयन सांस्कृतिक केंद्र, गढ़ी कैंट में आयोजित पूर्व सैनिकों एवं पूर्व सेना अधिकारियों की जन गोष्ठी और समन्वित संवाद कार्यक्रम में भाग लिया। कार्यक्रम में सैकड़ों गणमान्य पूर्व सैनिक उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का स्वागत और प्रारंभ
कार्यक्रम की शुरुआत में पूर्व मेजर जनरल गुलाब सिंह रावत, कर्नल अजय कोठियाल और कर्नल मयंक चौबे ने सरसंघचालक का पारंपरिक सम्मान किया। मंच संचालन राजेश सेठी ने किया।
इस अवसर पर छह सेवानिवृत्त जनरल, एक वाइस एडमिरल, डीजी कोस्ट गार्ड, कई ब्रिगेडियर और 50 से अधिक कर्नल रैंक के अधिकारी उपस्थित थे। बड़ी संख्या में पूर्व सैनिक अपने सैन्य परिधानों में शामिल हुए।
सरसंघचालक का संबोधन
भागवत ने कहा कि राष्ट्र की वास्तविक शक्ति समाज से आती है। यदि समाज संगठित और चरित्रवान होगा तो राष्ट्रीय सुरक्षा स्वतः सुदृढ़ होगी। उन्होंने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम और अन्य क्रांतिकारी आंदोलनों की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि स्वतंत्रता की चेतना कभी समाप्त नहीं हुई।
उन्होंने संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार का उल्लेख करते हुए कहा कि उनका उद्देश्य व्यक्ति निर्माण था, न कि चुनावी राजनीति। संघ ने प्रतिबंधों और सीमाओं के बावजूद समाज की शक्ति से आगे बढ़ना जारी रखा।
पूर्व सैनिकों से संवाद
दूसरे सत्र में पूर्व सैनिकों ने राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक समरसता, युवा पीढ़ी और नीतिगत मुद्दों पर सवाल पूछे।
-
अग्निवीर योजना पर जवाब देते हुए भागवत ने कहा कि किसी भी नई व्यवस्था को अनुभव के आधार पर परिमार्जित किया जाना चाहिए।
-
नेपाल, बांग्लादेश और कश्मीर के संदर्भ में उन्होंने कहा कि भारत को सुरक्षा और सांस्कृतिक दृष्टि दोनों से सजग रहना होगा। कश्मीर को उन्होंने भारत का अभिन्न अंग बताया।
-
हिंदू पहचान के संदर्भ में उन्होंने कहा कि भारतीय दृष्टि समावेशी है और समाज में समरसता अनिवार्य है। मंदिर, जलस्रोत और श्मशान जैसे सार्वजनिक स्थान सभी के लिए समान रूप से खुले होने चाहिए।
भागवत ने सोशल मीडिया पर बढ़ती कटुता पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि संवाद और शास्त्रार्थ की परंपरा को पुनर्जीवित करना होगा। जमीनी संवाद से ही नीति प्रभावी बनती है।
भ्रष्टाचार और सामाजिक जिम्मेदारी
उन्होंने भ्रष्टाचार को व्यवस्था की नहीं, नियत की समस्या बताया। बच्चों में संस्कार, आय में संयम और समाज के प्रति दायित्वबोध राष्ट्र निर्माण की आधारशिला हैं।
पलायन और विकास
गढ़वाल और पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन के मुद्दे पर उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय उद्यमिता को समाधान का आधार बताया। सुनियोजित प्रयासों से पहाड़ों की संभावनाएं साकार की जा सकती हैं।
समान नागरिक संहिता और जनसंख्या नीति
भागवत ने समान नागरिक संहिता (UCC) को राष्ट्रीय एकात्मता का साधन बताया और कहा कि स्थायी समाधान केवल व्यापक सामाजिक सहमति से संभव है। जनसंख्या असंतुलन पर दीर्घकालिक नीति बनाने की आवश्यकता भी उन्होंने जताई।
समाज सेवा और समापन
भागवत ने पूर्व सैनिकों से आग्रह किया कि वे समाज सेवा के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाएं। उन्होंने बताया कि संघ देशभर में 1 लाख 30 हजार से अधिक सेवा प्रकल्प चला रहा है और शताब्दी वर्ष में प्रत्येक नागरिक की भागीदारी महत्त्वपूर्ण है।
कार्यक्रम का समापन राष्ट्रीय गीत के सामूहिक गायन के साथ हुआ।



