
भारत की पारंपरिक विरासत खादी ने आज आधुनिक वैश्विक बाजार में सफलता का एक नया इतिहास रच दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कुशल नेतृत्व और दूरदर्शी मार्गदर्शन में खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) ने वित्तीय वर्ष 2025-26 में एक ऐसी ऐतिहासिक ऊंचाई को छुआ है, जिसने देश के आर्थिक परिदृश्य को बदल कर रख दिया है। इस वित्तीय वर्ष में खादी आयोग ने कुल 1,87,105 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड कारोबार दर्ज किया है, जो भारत के ग्रामीण अंचलों में पनप रही उद्यमशीलता और आर्थिक सशक्तिकरण की एक जीती-जागती तस्वीर पेश करता है।
एक दशक की अभूतपूर्व विकास यात्रा
नई दिल्ली के ऐतिहासिक गांधी दर्शन (राजघाट) कार्यालय से वित्तीय वर्ष 2025-26 के अनंतिम आंकड़े साझा करते हुए केवीआईसी के अध्यक्ष मनोज कुमार ने एक बेहद उत्साहजनक तस्वीर प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि बीते 12 वर्षों में खादी और ग्रामोद्योग के क्षेत्र में जो क्रांति आई है, उसकी पहले कभी कल्पना भी नहीं की गई थी। साल 2013-14 के आंकड़ों से तुलना करें तो खादी उत्पादों की बिक्री में आश्चर्यजनक रूप से 501 प्रतिशत का उछाल आया है, जबकि उत्पादन में 380 प्रतिशत और रोजगार के अवसरों में 56 प्रतिशत की शानदार बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
आंकड़ों की जुबानी खादी और ग्रामोद्योग की कहानी
अगर हम बीते एक दशक के सफर को आंकड़ों के आईने में देखें तो खादी की लोकप्रियता और स्वीकार्यता साफ नजर आती है। साल 2013-14 में जहां खादी और ग्रामोद्योग का कुल उत्पादन महज 26,109 करोड़ रुपये था, वह आज आसमान छूते हुए 1,25,296 करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच गया है। इसी तरह इसकी कुल बिक्री भी 31,154 करोड़ रुपये के मामूली आंकड़े से बढ़कर अब 1,87,105 करोड़ रुपये के ऐतिहासिक शिखर पर जा पहुंची है।
खादी वस्त्रों की बढ़ती धमक
विशेष रूप से खादी परिधानों के प्रति लोगों के लगाव में भारी इजाफा हुआ है। वर्ष 2013-14 में जहां खादी वस्त्रों का उत्पादन केवल 811 करोड़ रुपये था, वह अब बढ़कर 3,974 करोड़ रुपये हो गया है। वहीं इसकी बिक्री भी 1,081 करोड़ रुपये से छलांग लगाकर 7,869 करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है। प्रधानमंत्री के ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘लोकल टू ग्लोबल’ के आह्वान ने खादी को भारतीय पहनावे से निकालकर वैश्विक मंच पर एक प्रीमियम ब्रांड के रूप में स्थापित कर दिया है।
ग्रामोद्योग का अभूतपूर्व विस्तार
खादी के साथ-साथ ग्रामीण उद्योगों ने भी इस सफलता में कंधे से कंधा मिलाकर योगदान दिया है। साल 2013-14 में ग्रामोद्योग उत्पादों का उत्पादन 25,298 करोड़ रुपये था, जो अब बढ़कर 1,21,322 करोड़ रुपये हो चुका है। इसकी बिक्री में भी जबरदस्त तेजी देखी गई है और यह 30,073 करोड़ रुपये से बढ़कर 1,79,236 करोड़ रुपये के पार पहुंच गई है।
ग्रामीण रोजगार और युवा आकांक्षाओं को नए पंख
केवीआईसी ने देश से बेरोजगारी दूर करने और ग्रामीण युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने में अपनी भूमिका को पूरी शिद्दत से निभाया है। साल 2013-14 में जहां इस क्षेत्र से 1.30 करोड़ लोगों की आजीविका जुड़ी थी, वहीं वित्तीय वर्ष 2025-26 में यह संख्या बढ़कर 2.04 करोड़ हो गई है, जो अपने आप में एक बड़ा कीर्तिमान है।
प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP) का कमाल
इस योजना के अंतर्गत वित्त वर्ष 2025-26 में 66,494 नए सूक्ष्म उद्योगों और इकाइयों की नींव रखी गई। इन व्यवसायों को गति देने के लिए 7,375 करोड़ रुपये के ऋण स्वीकृत किए गए, जिसके एवज में 2,457 करोड़ रुपये की मार्जिन मनी सब्सिडी सीधे लाभार्थियों तक पहुंचाई गई। इस दूरदर्शी पहल के कारण देश के 7.31 लाख से अधिक लोगों को उनके घर के पास ही रोजगार के सम्मानजनक अवसर प्राप्त हुए।
नारी शक्ति का बढ़ता आत्मसम्मान और सशक्तिकरण
खादी की इस पूरी विकास यात्रा में देश की महिलाओं की भागीदारी सबसे प्रेरणादायक रही है। केवीआईसी ने कौशल विकास के जरिए महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए हैं।
हुनर से हासिल होती आत्मनिर्भरता
साल 2025-26 के दौरान आयोग द्वारा आयोजित विभिन्न हुनर और प्रशिक्षण कार्यक्रमों में कुल 79,682 लोगों ने हिस्सा लिया, जिनमें से आधे से कहीं अधिक यानी 47,382 केवल महिलाएं थीं। यह इस बात का प्रमाण है कि ग्रामीण महिलाएं अब खुद को आर्थिक रूप से स्वतंत्र बनाने के लिए आगे आ रही हैं।
महिला उद्यमियों की नई फौज
प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP) का लाभ उठाकर देश की 28,180 महिला उद्यमियों ने अपनी नई औद्योगिक इकाइयां शुरू की हैं। इन महिला स्टार्ट-अप्स के माध्यम से ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों की लगभग 3.09 लाख महिलाओं को सीधे तौर पर रोजगार मिला है, जिससे उनका सामाजिक और आर्थिक जीवन स्तर बेहतर हुआ है।
गौरवशाली भविष्य की ओर अग्रसर खादी
केवीआईसी के अध्यक्ष श्री मनोज कुमार के अनुसार, यह ऐतिहासिक सफलता प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के सशक्त नेतृत्व, पूज्य महात्मा गांधी के विचारों की प्रेरणा और देश के कोने-कोने में बैठे करोड़ों बुनकरों, कतिनों और शिल्पकारों के कड़े परिश्रम का मीठा फल है। खादी आज के समय में सिर्फ एक कपड़ा या उत्पाद नहीं रह गई है, बल्कि यह बदलते भारत, आत्मनिर्भरता और ग्रामीण समृद्धि की एक वैश्विक पहचान बन चुकी है।



