
रूद्रपुर। स्थायी लोक अदालत के अध्यक्ष बृजेन्द्र सिंह ने जानकारी देते हुए बताया कि विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987, भारतीय राजपत्र दिनांक 20 मार्च 2015 तथा उत्तराखण्ड सरकार के शासनादेश दिनांक 14 फरवरी 2020 के अंतर्गत स्थायी लोक अदालत केवल जनउपयोगी सेवाओं से संबंधित वादों की ही सुनवाई कर सकती है। इसके अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार के वादों को सुनने का क्षेत्राधिकार स्थायी लोक अदालत को प्राप्त नहीं है।
जनउपयोगी सेवाओं की श्रेणी में आने वाली सेवाएँ
उन्होंने बताया कि जनउपयोगी सेवाओं में वायु मार्ग, सड़क मार्ग एवं जल मार्ग द्वारा यात्रियों और माल के परिवहन से संबंधित यातायात सेवाएँ शामिल हैं। इसके साथ ही डाक, तार एवं टेलीफोन सेवाएँ, जनता को बिजली, प्रकाश अथवा पानी उपलब्ध कराने वाली संस्थाएँ, सार्वजनिक मल वहन एवं स्वच्छता प्रणाली, अस्पताल तथा उनसे संबद्ध औषधि वितरण केंद्रों द्वारा दी जाने वाली सेवाएँ भी इस श्रेणी में आती हैं। इसके अतिरिक्त बीमा सेवाएँ, शैक्षिक एवं शिक्षण संस्थानों द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाएँ, आवास एवं भू-संपदा सेवाएँ भी जनउपयोगी सेवाओं में सम्मिलित हैं।
बैंकिंग और वित्तीय सेवाएँ
बैंकिंग एवं वित्तीय सेवाओं को भी जनउपयोगी सेवा माना गया है। इसमें राष्ट्रीयकृत, अनुसूचित एवं बहुराष्ट्रीय बैंक, गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियाँ, चिट फंड एवं अन्य म्यूचुअल कंपनियाँ, निजी फाइनेंसर, सहकारी बैंक तथा बैंकिंग और ऋण प्रदान करने के व्यवसाय से जुड़ी सहकारी समितियाँ शामिल हैं, जो अपने सदस्यों एवं ग्राहकों को वित्तीय सुविधाएँ प्रदान करती हैं।
बैंकिंग विवाद जिनका निस्तारण स्थायी लोक अदालत में संभव
बृजेन्द्र सिंह ने बताया कि बैंकिंग अथवा वित्तीय सेवाओं से संबंधित कई विवाद ऐसे हैं, जिनका निस्तारण स्थायी लोक अदालत द्वारा किया जा सकता है। इनमें बैंकिंग सेवाओं में कमी, सहमत ब्याज दर से अधिक ब्याज की वसूली, लॉकर आदि के लिए बीमा प्रावधानों का अभाव, दोषपूर्ण एटीएम सेवाएँ, वाहन ऋण की किस्तों में चूक होने पर वित्तीय कंपनी द्वारा पेशी के माध्यम से वाहन उठाना, ऋण स्वीकृति से पूर्व खाली चेक प्राप्त करना, खाते में शेष राशि न होने के बावजूद बिना तिथि के पोस्ट डेटेड चेक लेना, बैंकों द्वारा अपने ग्राहकों को विभिन्न सेवाओं की समुचित जानकारी न देना तथा बिना पूर्व सूचना के नियम एवं शर्तों में परिवर्तन करना शामिल है।
स्थायी लोक अदालत के प्रमुख लाभ
स्थायी लोक अदालत का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसमें सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 तथा भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 के प्रावधान लागू नहीं होते। इसके कारण वादों का निस्तारण शीघ्रता से किया जाता है। वादकारियों से कोई न्यायालय शुल्क नहीं लिया जाता और स्थायी लोक अदालत का निर्णय अंतिम होता है। इसके साथ ही स्थायी लोक अदालत का पंचाट सिविल न्यायालय की डिक्री के समान ही निष्पादित किया जाता है, जिससे आम जनता को त्वरित और प्रभावी न्याय प्राप्त होता है।



