
देहरादून में उत्तराखण्ड के सार्वजनिक निगमों, निकायों और उपक्रमों में कार्यरत दैनिक वेतन, संविदा, उपनल, आउटसोर्स और विशेष श्रेणी के कर्मचारियों ने अपनी लंबित मांगों के समाधान न होने पर आंदोलन का ऐलान कर दिया है, जिससे प्रदेश में श्रमिक असंतोष बढ़ता नजर आ रहा है
सरकार को भेजा गया पत्र, नाराजगी हुई जाहिर
राज्य निगम कर्मचारी अधिकारी महासंघ ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर अपनी नाराजगी व्यक्त की है, जिसमें कहा गया है कि वर्ष 2025 से लगातार विभिन्न माध्यमों से नियमितीकरण और अन्य मांगों के समाधान के लिए अनुरोध किया जा रहा है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है, जिसके चलते कर्मचारियों में गहरा आक्रोश पैदा हो गया है
प्रमुख मांगें क्या हैं
महासंघ के अनुसार कर्मचारियों की मुख्य मांगों में संविदा, उपनल, आउटसोर्स और दैनिक वेतनभोगी कर्मियों का शीघ्र नियमितीकरण कर उन्हें सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना शामिल है, इसके अलावा सार्वजनिक निगमों में खाली पदों को भरने और संस्थागत ढांचे में सुधार की मांग भी की गई है
इसके साथ ही ठेकेदारी व्यवस्था को समाप्त करने, वेतन विसंगति समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक करने, एसीपी और एमएसीपी की पुरानी व्यवस्था को फिर से लागू करने तथा न्यायालयों के आदेशों का सही तरीके से पालन सुनिश्चित करने की मांग भी प्रमुख रूप से उठाई गई है
पेंशन और चिकित्सा सुविधाओं पर भी जोर
वर्ष 2014 के बाद नियुक्त कर्मचारियों को पेंशन का लाभ देने, गोल्डन कार्ड के तहत स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने और लंबित चिकित्सा प्रतिपूर्ति का जल्द भुगतान करने की मांग भी महासंघ ने उठाई है
इसके अलावा पदोन्नति प्रक्रिया को सरल बनाने और महासंघ को परिसंघ के रूप में मान्यता देने की मांग भी कर्मचारियों की प्राथमिकता में शामिल है
आंदोलन की रूपरेखा तय
10 अप्रैल 2026 को देहरादून में आयोजित महासंघ की कार्यसमिति की बैठक में यह निर्णय लिया गया कि यदि सरकार जल्द सकारात्मक कदम नहीं उठाती है, तो चरणबद्ध आंदोलन शुरू किया जाएगा
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 16 अप्रैल को प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की जाएगी, 23 अप्रैल को हल्द्वानी बस अड्डे पर धरना-प्रदर्शन होगा, 30 अप्रैल को हरिद्वार स्थित गढ़वाल मंडल विकास निगम कार्यालय में प्रदर्शन किया जाएगा और 12 मई 2026 से देहरादून के एकता विहार में क्रमिक अनशन शुरू किया जाएगा
उग्र आंदोलन की चेतावनी
महासंघ ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि इसके बाद भी सरकार की ओर से कोई ठोस पहल नहीं की गई, तो आंदोलन को और अधिक तेज और उग्र रूप दिया जाएगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन और प्रशासन की होगी



