अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 69 पैसे लुढ़का, 92.18 के ऐतिहासिक निचले स्तर पर

नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में अमेरिका-ईरान संघर्ष बढ़ने से पैदा हुए भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में आए उछाल के कारण बुधवार को शुरुआती कारोबार में भारतीय रुपया 69 पैसे टूटकर 92.18 प्रति डॉलर के सर्वकालिक निचले स्तर पर आ गया। विदेशी मुद्रा कारोबारियों के अनुसार ईरान संकट की वजह से ब्रेंट क्रूड वायदा कारोबार में 82 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया है, जिससे निवेशकों की धारणा प्रभावित हुई है। इससे पहले रुपया जनवरी के आखिर में 91.9875 के स्तर तक गया था। लेकिन आज पहली बार यह 92 के पार चला गया।
अंतरबैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में रुपया 92.05 पर खुला और फिर फिसलकर 92.18 के निचले स्तर पर पहुंच गया। सोमवार को रुपया 91.49 पर बंद हुआ था। मंगलवार को होली के उपलक्ष्य में बाजार बंद रहा था। विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से भारत का आयात बिल बढ़ने का जोखिम है, क्योंकि देश अपनी ईंधन जरूरत का 85 प्रतिशत आयात के माध्यम से पूरा करता है।
नफा-नुकसान
- इलेक्ट्रॉनिक्स, रसायन, मशीनरी और पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात को फायदा
- लेकिन कच्चे तेल के आयात पर ज्यादा निर्भरता के कारण इम्पोर्ट बिल बढ़ जाता है
- इससे रुपये में गिरावट से होने वाले फायदे खत्म हो जाते हैं और व्यापार घाटा बढ़ता है
- मैन्युफैक्चरिंग में कच्चे माल के आयात की लागत लगभग एक तिहाई है
- इनपुट लागत बढ़ने से निर्यात प्रतिस्पर्धा कम हो जाती है और इम्पोर्ट कॉस्ट बढ़ जाती है
क्या होगा असर?
शनिवार से कच्चे तेल की कीमत में 13 फीसदी तेजी आ चुकी है। इसके अलावा, घरेलू शेयर बाजार से विदेशी पूंजी की निरंतर निकासी और महंगे आयात से व्यापार संतुलन बिगड़ने के डर ने भी रुपये पर दबाव बनाया है। शेयर बाजार के आंकड़ों के अनुसार, सोमवार को विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) ने 3,295.64 करोड़ रुपये के शेयर बेचे थे।
कोटक महिंद्रा बैंक ने एक नोट में कहा कि अगर पश्चिम एशिया में लंबे समय तक संकट बना रहता है तो इससे मिडिल ईस्ट से आने वाला रेमिटेंस और कैपिटल फ्लो प्रभावित हो सकता है। चालू खाते का घाटा बढ़ने, महंगाई, रुपये में गिरावट और लोअर जीडीपी ग्रोथ में गिरावट से भारत की इकॉनमी प्रभावित हो सकती है।
तेल की कीमत में तेजी ऐसे समय आई है जब रुपये पहले ही कई महीनों से दबाव में है। इस साल इसमें डॉलर के मुकाबले 2 फीसदी गिरावट आई है और यह एमर्जिंग मार्केट में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली करेंसीज में शामिल है। पिछले साल रुपये की कीमत डॉलर के मुकाबले 5 फीसदी गिरी थी।


